Wednesday, September 12, 2012

માણસ વારંવાર મરે છે

કોઈ સ્થળે બેચાર મરે છે,
ક્યાંક કશે દસબાર મરે છે;
હિન્દુ મુસ્લિમ બંને સલામત,
માણસ વારંવાર મરે છે.

-ખલીલ ધનતેજવી

Tuesday, September 11, 2012

પાણીને પાણી બતાવશું

સંઘર્ષ કેવો હોય છે એ જાણી બતાવશું,
ઝરણું કહે પહાળ ને ટાણી બતાવશું,
ડુબી જવાની પળને ડુબાળીશું આપણે,
પાણીમાં રહીને પાણીને પાણી બતાવશું.

કિરણ ચૌહાણ

Friday, September 7, 2012

मुनव्वर राना

कोइ गर पुछ लेगा तो उसे क्या मुंह दिखायेंगे
कि न्न्हें मियांको क्यों कंवारा छोड आये है ?

दिखावे की मोहब्बत से वो कैसे मुत्मइन होंगे
कि जो उसकी मोहब्बत बेतहाशा छोड़ आए हैं

न कुछ खाने को जी चाहे न कुछ पीने को जी चाहे
हम अपने ह्म-निवाला हम-पियाला छोड़ आए हैं

मुहाजिर हैं मगर हम एक दुनिया छोड़ आए है
तुम्हारे पास जितना है हम उतना छोड़ आए हैं

कई आँखें अभी तक ये शिकायत करती रहती हैं
कि हम बहते हुए काजल का दरिया छोड़ आए हैं

कहानी का ये हिस्सा आज तक सबसे छुपाया है
कि हम मिटटी की ख़ातिर अपना सोना छोड़ आए हैं

ख़ुदा जाने ये हिजरत थी कि हिजरत का तमाशा था
उजाले की तमन्ना में उजाला छोड़ आए हैं

ये ख़ुदगरज़ी का जज़्बा आज तक हमको रुलाता है
कि हम बेटे तो ले आए भतीजा छोड़ आए हैं

अक़ीदत से कलाई पर जो एक बच्ची ने बाँधी थी
वो राखी छोड़ आए हैं वो रिश्ता छोड़ आए हैं

न जाने कितने चेहरों को धुंआ करके चले आए
न जाने कितनी आँखों को छलकता छोड़ आए हैं

गले मिलती हुई नदियाँ गले मिलते हुए मज़हब
इलाहाबाद में कैसा नज़ारा छोड़ आए है

वो इक त्यौहार में घर की फसीलों पर दिये रखना
अब आँखें पूछती है क्यों उजाला छोड़ आए है

वो जिनसे रिश्तेदारी तो नहीं थी हाँ तअल्लुक़ था
वो लक्ष्मी छोड़ आए है वो दुर्गा छोड़ आए है

सभी त्यौहार मिल - जुल कर मनाते थे वहाँ जब थे
दिवाली छोड़ आए है दशहरा छोड़ आए है

हिफ़ाज़त के लिए मस्जिद को घेरे हों कई मंदिर
रवादारी का ये दिलकश नज़ारा छोड़ आए है

जन्म जिसने दिया हमको उसे तो साथ ले आए
मगर आते हुए मैया यशोदा छोड़ आए हैं

बिछड़ते वक़्त की वो सिसकियाँ वो फूट कर रोना
कि जैसे मछलियों को हम सिसकता छोड़ आए है

हंसी आती है अपनी ही अदाकारी पे ख़ुद हमको
बने फिरते हैं यूसुफ़ और ज़ुलेख़ा छोड़ आए हैं

बिछड़ते वक़्त था दुश्वार उसका सामना करना
सो उसके नाम हम अपना संदेशा छोड़ आए हैं

बुरे लगते हैं शायद इसलिए ये सुरमई बादल
किसी की ज़ुल्फ़ को शानों पे बिखरा छोड़ आए हैं

कई होंटों पे ख़ामोशी की पपड़ी जम गयी होगी
कई आँखों में हम अश्कों का पर्दा छोड़ आए हैं

सुनहरे ख़्वाब की ताबीर अच्छी क्यूँ नहीं होती
जो आँखों में रहा करता था चेहरा छोड़ आए हैं

मुहब्बत की कहानी को मुकम्मल कर नहीं पाये
अधूरा था जो किस्सा वो अधूरा छोड़ आए हैं

वो ख़त जिसपर तेरे होंटों ने अपना नाम लिक्खा था
तेरे काढ़े हुए तकिये पे रक्खा छोड़ आये हैं

बसी थी जिसमें ख़ुशबू मेरी अम्मी की जवानी की
वो चादर छोड़ आयें है वो तकिया छोड़ आए हैं

महीनों तक तो अम्मी नींद में भी बड़बड़ाती थीं
सुखाने के लिए छत पर पुदीना छोड़ आये हैं

हमारी अहलिया तो आ गयी माँ छूट गयी आख़िर
कि हम पीतल उठा लाये हैं सोना छोड़ आये हैं

शकर इस जिस्म से खिलवाड़ करना कैसे छोड़ेगी
कि हम जामुन के पेड़ों को अकेला छोड़ आये हैं

किसी नुक्सान की भरपाई तो अब हो नहीं सकती
तो फिर क्या सोचना क्या लाए कितना छोड़ आये हैं

रेआया थे तो फिर हाकिम का कहना क्यों नहीं माना
अगर हम शाह थे तो क्यों रेआया छोड़ आये हैं

भतीजी अब सलीक़े से दुपट्टा ओढ़ती होगी
वहीं, झूले में हम जिसको हुमकता छोड़ आये हैं

बहुत कम दाम में बनिए ने खेतों को ख़रीदा था
हम इसके बावज़ूद उस पर बकाया छोड़ आए हैं

ज़मीने -नानक-ओ-चिश्ती,ज़बाने -ग़ालिब-ओ-तुलसी
ये सब कुछ पास था अपने ये सारा छोड़ आये हैं

अगर लिखने पे आ जाएँ सियाही ख़त्म हो जाए
कि तेरे पास आये हैं तो क्या -क्या छोड़ आये हैं

ग़ज़ल ये ना-मुक़म्मल ही रहेगी उम्र भर "राना"
कि हम सरहदसे पीछे इसका मक़्ता छोड आयें है

मुहाजिर हैं मगर हम एक दुनिया छोड़ आए हैं
तुम्हारे पास जितना है हम उतना छोड़ आए हैं

कहानी का ये हिस्सा आज तक सब से छुपाया है
कि हम मिट्टी की ख़ातिर अपना सोना छोड़ आए हैं

नई दुनिया बसा लेने की इक कमज़ोर चाहत में
पुराने घर की दहलीज़ों को सूना छोड़ आए हैं

अक़ीदत से कलाई पर जो इक बच्ची ने बाँधी थी
वो राखी छोड़ आए हैं वो रिश्ता छोड़ आए हैं

किसी की आरज़ू के पाँवों में ज़ंजीर डाली थी
किसी की ऊन की तीली में फंदा छोड़ आए हैं

पकाकर रोटियाँ रखती थी माँ जिसमें सलीक़े से
निकलते वक़्त वो रोटी की डलिया छोड़ आए हैं

जो इक पतली सड़क उन्नाव से मोहान जाती है
वहीं हसरत के ख़्वाबों को भटकता छोड़ आए हैं

यक़ीं आता नहीं, लगता है कच्ची नींद में शायद
हम अपना घर गली अपना मोहल्ला छोड़ आए हैं

हमारे लौट आने की दुआएँ करता रहता है
हम अपनी छत पे जो चिड़ियों का जत्था छोड़ आए हैं

हमें हिजरत की इस अन्धी गुफ़ा में याद आता है
अजन्ता छोड़ आए हैं एलोरा छोड़ आए हैं

सभी त्योहार मिलजुल कर मनाते थे वहाँ जब थे
दिवाली छोड़ आए हैं दशहरा छोड़ आए हैं

हमें सूरज की किरनें इस लिए तक़लीफ़ देती हैं
अवध की शाम काशी का सवेरा छोड़ आए हैं

गले मिलती हुई नदियाँ गले मिलते हुए मज़हब
इलाहाबाद में कैसा नज़ारा छोड़ आए हैं

हम अपने साथ तस्वीरें तो ले आए हैं शादी की
किसी शायर ने लिक्खा था जो सेहरा छोड़ आए हैं

कई आँखें अभी तक ये शिकायत करती रहती हैं
के हम बहते हुए काजल का दरिया छोड़ आए हैं

शकर इस जिस्म से खिलवाड़ करना कैसे छोड़ेगी
के हम जामुन के पेड़ों को अकेला छोड़ आए हैं

वो बरगद जिसके पेड़ों से महक आती थी फूलों की
उसी बरगद में एक हरियल का जोड़ा छोड़ आए हैं

अभी तक बारिसों में भीगते ही याद आता है
के छप्पर के नीचे अपना छाता छोड़ आए हैं

भतीजी अब सलीके से दुपट्टा ओढ़ती होगी
वही झूले में हम जिसको हुमड़ता छोड़ आए हैं

ये हिजरत तो नहीं थी बुजदिली शायद हमारी थी
के हम बिस्तर में एक हड्डी का ढाचा छोड़ आए हैं

हमारी अहलिया तो आ गयी माँ छुट गए आखिर
के हम पीतल उठा लाये हैं सोना छोड़ आए हैं

महीनो तक तो अम्मी ख्वाब में भी बुदबुदाती थीं
सुखाने के लिए छत पर पुदीना छोड़ आए हैं

वजारत भी हमारे वास्ते कम मर्तबा होगी
हम अपनी माँ के हाथों में निवाला छोड़ आए हैं

यहाँ आते हुए हर कीमती सामान ले आए
मगर इकबाल का लिखा तराना छोड़ आए हैं

हिमालय से निकलती हर नदी आवाज़ देती थी
मियां आओ वजू कर लो ये जूमला छोड़ आए हैं

वजू करने को जब भी बैठते हैं याद आता है
के हम जल्दी में जमुना का किनारा छोड़ आए हैं

उतार आये मुरव्वत और रवादारी का हर चोला
जो एक साधू ने पहनाई थी माला छोड़ आए हैं

जनाबे मीर का दीवान तो हम साथ ले आये
मगर हम मीर के माथे का कश्का छोड़ आए हैं

उधर का कोई मिल जाए इधर तो हम यही पूछें
हम आँखे छोड़ आये हैं के चश्मा छोड़ आए हैं

हमारी रिश्तेदारी तो नहीं थी हाँ ताल्लुक था
जो लक्ष्मी छोड़ आये हैं जो दुर्गा छोड़ आए हैं

गले मिलती हुई नदियाँ गले मिलते हुए मज़हब,
इलाहाबाद में कैसा नाज़ारा छोड़ आए हैं

कल एक अमरुद वाले से ये कहना पडा हमको
जहां से आये हैं हम इसकी बगिया छोड़ आए हैं

वो हैरत से हमे तकता रहा कुछ देर फिर बोला
वो संगम का इलाका छुट गया या छोड़ आए हैं

अभी हम सोच में गूम थे के उससे क्या कहा जाए
हमारे आन्सुयों ने राज खोला छोड़ आए हैं

मुहर्रम में हमारा लखनऊ इरान लगता था
मदद मौला हुसैनाबाद रोता छोड़ आए हैं

जो एक पतली सड़क उन्नाव से मोहान जाती है
वहीँ हसरत के ख्वाबों को भटकता छोड़ आए हैं

महल से दूर बरगद के तलए मवान के खातिर
थके हारे हुए गौतम को बैठा छोड़ आए हैं

तसल्ली को कोई कागज़ भी चिपका नहीं पाए
चरागे दिल का शीशा यूँ ही चटखा छोड़ आए हैं

सड़क भी शेरशाही आ गयी तकसीम के जद मैं
तुझे करके हिन्दुस्तान छोटा छोड़ आए हैं

हसीं आती है अपनी अदाकारी पर खुद हमको
बने फिरते हैं युसूफ और जुलेखा छोड़ आए हैं

गुजरते वक़्त बाज़ारों में अब भी याद आता है
किसी को उसके कमरे में संवरता छोड़ आए हैं

हमारा रास्ता तकते हुए पथरा गयी होंगी
वो आँखे जिनको हम खिड़की पे रखा छोड़ आए हैं

तू हमसे चाँद इतनी बेरुखी से बात करता है
हम अपनी झील में एक चाँद उतरा छोड़ आए हैं

ये दो कमरों का घर और ये सुलगती जिंदगी अपनी
वहां इतना बड़ा नौकर का कमरा छोड़ आए हैं

हमे मरने से पहले सबको ये ताकीत करना है
किसी को मत बता देना की क्या-क्या छोड़ आए हैं

हमीं ग़ालिबसे नादीम है, हमीं तुलसीसे शर्मिंदा
हमींने मीरको छोडा है, मीरा छोड आए हैं

अगर लिखने पे आ जायें तो सियाही ख़त्म हो जाये
कि तेरे पास आयें है तो क्या-क्या छोड आये हैं

ग़ज़ल ये ना-मुक़म्मल ही रहेगी उम्र भर "राना"
कि हम सरहदसे पीछे इसका मक़्ता छोड आयें है

सियासतने सुना है नाम तक उसका बदल डाला
वही हम जिसको कहतें है "बडौदा" छोड आए हैं

जहां हम चाय पीनेके बहाने रोज़ मिलते थे
यहां आते हुए वो चायख़ाना छोड आए हैं

अगर हम ध्यानसे सुनतें तो मुमकिन है पलट जातें
मगर "आजाद" का ख़ुत्बा अधुरा छोड आए हैं

महिनों तक तो अम्मी नींदमें भी बडबडाती थी
सुख़ानेके लिये छत पर पुदीना छोड आए हैं

गुज़रतें वक़्त बाज़ारोंसे अब भी ध्यान आता है
किसीको उसके कमरेमें संवरता छोड आए हैं

हमारे घरमें बिल्ली और तोता साथ रेह्तें थे
मुहब्बत हम तेरा असली नमूना छोड आए हैं

हंसी आती है अपनी ही अदाकारी पे खुद हमको
बने फिरतें है यूसुफ और जुलेख़ा छोड आए हैं

हमीं ग़ालिबसे नादीम है, हमीं तुलसीसे शर्मिंदा
हमींने मीरको छोडा है, मीरा छोड आए हैं

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मुहाजिर हैं मगर हम एक दुनिया छोड़ आए हैं,
तुम्हारे पास जितना है हम उतना छोड़ आए हैं ।

कहानी का ये हिस्सा आज तक सब से छुपाया है,
कि हम मिट्टी की ख़ातिर अपना सोना छोड़ आए हैं ।

नई दुनिया बसा लेने की इक कमज़ोर चाहत में,
पुराने घर की दहलीज़ों को सूना छोड़ आए हैं ।

अक़ीदत से कलाई पर जो इक बच्ची ने बाँधी थी,
वो राखी छोड़ आए हैं वो रिश्ता छोड़ आए हैं ।

किसी की आरज़ू के पाँवों में ज़ंजीर डाली थी,
किसी की ऊन की तीली में फंदा छोड़ आए हैं ।

पकाकर रोटियाँ रखती थी माँ जिसमें सलीक़े से,
निकलते वक़्त वो रोटी की डलिया छोड़ आए हैं ।

जो इक पतली सड़क उन्नाव से मोहान जाती है,
वहीं हसरत के ख़्वाबों को भटकता छोड़ आए हैं ।

यक़ीं आता नहीं, लगता है कच्ची नींद में शायद,
हम अपना घर गली अपना मोहल्ला छोड़ आए हैं ।

हमारे लौट आने की दुआएँ करता रहता है,
हम अपनी छत पे जो चिड़ियों का जत्था छोड़ आए हैं ।

हमें हिजरत की इस अन्धी गुफ़ा में याद आता है,
अजन्ता छोड़ आए हैं एलोरा छोड़ आए हैं ।

सभी त्योहार मिलजुल कर मनाते थे वहाँ जब थे,
दिवाली छोड़ आए हैं दशहरा छोड़ आए हैं ।

हमें सूरज की किरनें इस लिए तक़लीफ़ देती हैं,
अवध की शाम काशी का सवेरा छोड़ आए हैं ।

गले मिलती हुई नदियाँ गले मिलते हुए मज़हब,
इलाहाबाद में कैसा नज़ारा छोड़ आए हैं ।

हम अपने साथ तस्वीरें तो ले आए हैं शादी की,
किसी शायर ने लिक्खा था जो सेहरा छोड़ आए हैं ।

कई आँखें अभी तक ये शिकायत करती रहती हैं,
के हम बहते हुए काजल का दरिया छोड़ आए हैं ।

शकर इस जिस्म से खिलवाड़ करना कैसे छोड़ेगी,
के हम जामुन के पेड़ों को अकेला छोड़ आए हैं ।

वो बरगद जिसके पेड़ों से महक आती थी फूलों की,
उसी बरगद में एक हरियल का जोड़ा छोड़ आए हैं ।

अभी तक बारिसों में भीगते ही याद आता है,
के छप्पर के नीचे अपना छाता छोड़ आए हैं ।

भतीजी अब सलीके से दुपट्टा ओढ़ती होगी,
वही झूले में हम जिसको हुमड़ता छोड़ आए हैं ।

ये हिजरत तो नहीं थी बुजदिली शायद हमारी थी,
के हम बिस्तर में एक हड्डी का ढाचा छोड़ आए हैं ।

हमारी अहलिया तो आ गयी माँ छुट गए आखिर,
के हम पीतल उठा लाये हैं सोना छोड़ आए हैं ।

महीनो तक तो अम्मी ख्वाब में भी बुदबुदाती थीं,
सुखाने के लिए छत पर पुदीना छोड़ आए हैं ।

वजारत भी हमारे वास्ते कम मर्तबा होगी,
हम अपनी माँ के हाथों में निवाला छोड़ आए हैं ।

मुनव्वर राना

Tuesday, September 4, 2012

આરતી ઊતારવાની એમને આદત હતી

આરતી ઊતારવાની એમને આદત હતી,
સૌને ઈશ્વર માનવાની એમને આદત હતી.

એમના માટે ચિત્તા પણ ઝૂલતી રાખો તમે,
હિંચકા પર બેસવાની એમને આદત હતી.

સ્વર્ગમાં જઈ ખૂબ ગાળાગાળી કરતા થઇ ગયા,
શ્રલોક કાયમ બોલવાની એમને આદત હતી.

જિંદગીનાં માર્ગ પર ચાલ્યા વગર હાંફી ગયા,
દોરડા પર દોડવાની એમને આદત હતી.

વૃક્ષ સૌ હડતાલ પર છે જેમની તરફેણમાં,
પાન લીલા તોડવાની એમને આદત હતી.

ભાવેશ ભટ્ટ

ઉંદરડા

દિશા કે લક્ષ્ય કે ઉદ્દેશ છોડ ઉંદરડા,
બધાય દોડે છે અહીં, તું ય દોડ ઉંદરડા.

ગમે તો ઠીક, અને ના ગમે તો તારા ભોગ
આ જિંદગી એ ફરજીયાત હોડ ઉંદરડા.

કોઈને પાડીને ઉપર જવાનું શીખી લે
શિખર સુધીનો પછી સાફ રોડ ઉંદરડા.

આ એક-બે કે હજારોની વાત છે જ નહીં
બધા મળીને છે છસ્સો કરોડ ઉંદરડા.

થકાન, હાંફ, ને સપનાં વગરની સૂની નજર
તમામ દોડનો બસ આ નિચોડ ઉંદરડા.

વિવેક કાણે ‘સહજ’

ફાટી ગઈ છે જાત, કબીરા.

ટૂંકી ટચરક વાત, કબીરા,
લાંબી પડશે રાત, કબીરા.

અવસર કેવળ એક જ દિ’નો,
વચ્ચે મહિના સાત, કબીરા.

ખુલ્લમખુલ્લી પીઠ મળી છે,
મારે તેની લાત, કબીરા.

કાપડ છો ને કાણી પૈનું,
પાડો મોંઘી ભાત, કબીરા.

જીવ હજીએ ઝભ્ભામાં છે,
ફાટી ગઈ છે જાત, કબીરા.

ચંદ્રેશ મકવાણા ‘નારાજ’

Monday, September 3, 2012

जो हो मालूम गेहराई तो दरिया पार क्या करना

पनाहो में जो आया हो तो उस पर वार क्या करना
जो दिल हारा हुआ हो उस पे फिर अधिकार क्या करना
मोहब्बत का मज़ा तो डूबने की कश्मकश में है
जो हो मालूम गेहराई तो दरिया पार क्या करना

- कुमार विश्वास

Friday, August 31, 2012

દિવાનેખાસ જેવું કઈં નથી

કોઇ પણ આવી શકે ને આવી ને જઈ પણ શકે
જિંદગી છે આ દિવાનેખાસ જેવું કઈં નથી
ડૉ. મધુમતિ મહેતા

Friday, August 24, 2012

सब कुछ था बेवफाई न थी

वो हमसफ़र था मगर उसमे हमनवाई न थी
के धुप छाँव का आलम न रहा जुदाई न थी

अदावते थी तागाफूल था रंजिशे थी मगर
बिछड़नेवाले में सब कुछ था बेवफाई न थी

बिछड़ते वक्त उन आँखों में थी हमारी ग़ज़ल
ग़ज़ल भी वो के कभी किसीको जो सुनाई न थी

Tuesday, August 14, 2012

મંદિરના કોક ખુણે મસ્જીદ કરી શકું

ગઝલોની ગઝલો અંકિત કરી શકું
એ રીતે સૂર્યને લજ્જિત કરી શકું
તો જ થાશે દિલમાં હાશ જો
મંદિરના કોક ખુણે મસ્જીદ કરી શકું

- પૌલિન શાહ

Saturday, August 11, 2012

મૈત્રીનું મૂલ્ય કૃષ્ણને દ્વારે જ થાય છે

તાંદુલી તત્વ હેમથી ભારે જ થાય છે,
કિંતુ મળે જો લાગણી ત્યારે જ થાય છે.
જ્યાં ત્યાં કદીય હાથ ના લંબાવ; ઓ હૃદય !
મૈત્રીનું મૂલ્ય કૃષ્ણને દ્વારે જ થાય છે.

Saturday, July 28, 2012

તું અંદર નથી

ચાલ માન્યું કે તું પથ્થર નથી,
તોય તું એટલો સધ્ધર નથી..
લોકો લૂંટી જાય છે મંદિર ને પણ,
અર્થ એનો એ જ કે તું અંદર નથી..

Wednesday, July 18, 2012

યે જહાં ઔર હૈ

તબદિલીયાં જહાં કી રસમો રિવાજ ક્યા હૈ
વે લોગ જાનતે હૈ, કલ ક્યા થા આજ ક્યા હૈ
(વો ભી એક દૌર થા, યે ભી એક દૌર હૈ
વો જહાં ઔર થા, યે જહાં ઔર હૈ...)

જીંદગી કે હૈ ચહેરે કઈ, ઔર ઈસપે હૈ પહેરે કઈ,
દેખીયે તો યહાં કુછ નહીં, સોચીયે કાબીલે ગૌર હૈ..
(વો ભી એક દૌર થા, યે ભી એક દૌર હૈ
વો જહાં ઔર થા, યે જહાં ઔર હૈ...)

જીંદગી કે નયે સાંઝ પર, ક્યું થીરકતે હૈ બાદલ,
લુંટ ગઈ હૈ કલી કી હંસી, છીન ગયા ફુલો કા બચપન,
ખામોશીમે બડા શોર હૈ...
(વો ભી એક દૌર થા, યે ભી એક દૌર હૈ
વો જહાં ઔર થા, યે જહાં ઔર હૈ...)

શાયરી શાયરી દિલ કી આવાજ હૈ મેરી,
(કીસકો સુનાયે કીસે બતાયે દુનિયા કી દાસ્તાન
હમસે ખફા હૈ, હમસે જુદા હૈ કલ થે જો મહેરબાન)
શાયરી શાયરી દિલ કી આવાજ હૈ મેરી,

આઓ દિલો કો ફિર સે મિલાયે કિરદાર નેક હો
દુરી ભુલાકે નફરત મિટા કે હમ ફીર સે એક હો


હમ ફીર સે એક હો
હમ ફીર સે એક હો
હમ ફીર સે એક હો

Thursday, July 5, 2012

દોઢ મિસરાન ગઝલો

તમારા નામ ની સાથે અમારું નામ જોડું છું
રિવાજો આમ તોડું છું

નથી સહેલું જરાયે પણ
ગઝલ જાણે કલાઈ હોય તારી એમ મોડું છું

તમારા રૂપની સાથે
હું મારા શેર મૂકીને વખાણું છું વખોડું છું

કર્યું ચાલું જે દિવસથી
દિવસ એ ને હજુ આજે હું બસ દોડું જ દોડું છું

કરી હું શું લઈશ? ના પૂછ
પ્રતિબિંબ રાખીને અકબંધ અરીસાઓ હું ફોડું છું

નજર એની કટારી છે
તો હું યે ભર સભા માં સલામી તીર છોડું છું

બરડ છે કેટલું હોવું
બધી આ શક્યતાઓ ને હું તોડું છું ને જોડું છું

દસે દરિયા મહીં મૃગજળ
અવિરત સ્થિર છે ને હું નિરંતર કેમ દોડું છું ?

આ તારી યાદને બિસ્તરમાં બાંધીને પછી એને
બિછાવું છું ને ઓઢું છું

© તોફાની ત્રિપુટી

Tuesday, July 3, 2012

ફરીથી એકડો ઘૂટું?

એક તાજી જવાન વિધવાને
એની પહેલા ધોરણ માં ભણતી
એક માત્ર બાળકીએ
પાટી-પેન હાથ માં લઇ પ્રશ્ન પૂછ્યો:
મમ્મી, ફરીથી એકડો ઘૂટું?

મકરંદ મુસળે

Monday, July 2, 2012

‘દફનાને’ કે બાદ ‘જલાયા’ નહીં જાતા?

વો આતી હૈ રોજ
મેરી કબ્ર પર
અપને વો નયે
હમસફર કે સાથ….
કૌન કહેતા હૈ
‘દફનાને’ કે બાદ
‘જલાયા’ નહીં જાતા ?

Friday, June 29, 2012

जिंदगी जब लेना शुरु करती है

"जिंदगी से आप जो भी बहेतर से बहेतर ले सको.. ले लो..
क्योंकि..
जिंदगी जब लेना शुरु करती है तो सांसे भी नहीं छोड़ती.."

Friday, June 8, 2012

बम्बई

तन्हाई को खुदमें कभी पलने नही देती
बम्बई किसी बिमार को चलने नही देती

शोहरत यहांकी इस कदर है रोंदती सबको
ये मुफलिसि को चैन से जलने नही देती

जी ये छुपाने शर्म को क्या क्या दिखाती है
ये रोशनी जो बेबसी खलने नही देती

बेशक यहां रह लो मगर ये बात भी सोचो
है फूलती वो खुद मगर फलने नही देती

गर खानी ही है ठोकरें तो कोई गम ना है
पर बाद में ज़ख़्म को मलने नही देती

वो झोंपडोको ही जलाके जगमगाती है,
कुछ भी कर के शाम वो ढलने नहीं देती

- सौरभ पंडया

Wednesday, June 6, 2012

તું જ્યાંથી પતે છે હું ત્યાંથી શરુ છું

ક્રિએટીવ વિચારોમાં શબ્દો ભરું છું
અને તું કહે છે કવિતા કરું છું


આ જીવનનો શિડ્યુલ અજબ ખોરવાયો
મરું છું જીવું છું, જીવું છું મરું છું

મળે જો ફરી ક્યાંક ટૂંકા જીવનમાં
તને શું કહીશ એ હું ગોખ્યા કરુ છું

ઉડી સાત દરિયા પરી તું બની ગઈ
અને હું બરોડા થી મુંબઈ ફરું છું

કરેલા તેં જથ્થામાં નેતાની પેઠે
એ પ્રૉમિસનાં પૂલમાં હજીએ તરું છું

નથી કાર્ડ કૉલિંગ, અહીં ISD લાગે
એ બિલ સૌ હજી હપ્તે-હપ્તે ભરું છું

આ વાંચીને લાગે કે મૅટર પતી ગઈ
તું સાચવજે જાનુ ! હું ઘાયલ વરૂ છું

મૂકી દે ને સ્પર્ધા હવે મારી સાથે
તું જ્યાંથી પતે છે હું ત્યાંથી શરુ છું

સૌરભ પંડ્યા

Friday, May 11, 2012

આંગળાની ભૂલ છે કે ટાંકણાની ?

વાત છે લોહી ઊડ્યું એ છાંટણાની.
ત્યાં ગણતરી શું કરું હું આંકડાની ?

બોલ હે ઈશ્વર ! મને કંડારવામાં
આંગળાની ભૂલ છે કે ટાંકણાની ?

સાવ સુક્કા વૃક્ષ જેવું મોં કરીને,
પાંદડાંની વાત કે’ છે, પાંદડાંની ?

વૃદ્ધથી રડવું જ રોકી ના શકાયું,
વાત જ્યારે નીકળી આ બાંકડાની.

એક માણસ નામની ફૂટી છે શીશી,
ને ભરાણી છે સભાઓ ઢાંકણાંની.

- અનિલ ચાવડા

Thursday, April 19, 2012

औक़ातमें रेहना सीखो

इश्क़ करना है तो दर्द भी सेहना सीखो
वरना ऐसा करो, औक़ातमें रेहना सीखो

Monday, April 2, 2012

ઝણઝણાટી જોઇએ

મોલ મબલખ પામવા ફળદ્રુપ માટી જોઇએ
કાવ્યનું એવું જ ખાતું : ઝણઝણાટી જોઇએ

કેમ સાલું પથ્થરોમાં ઘાસ ઉગી નીકળે ?
શક્ય છે કે એમને થોડી રુંવાટી જોઇએ

જીંદગી અખબાર છે, અખબારનું લક્ષણ કહું ?
કોક ખૂણે, કોક પાને, સનસનાટી જોઇએ

કાચ હોવાથી, અરીસો થઈ જશે : એવું નથી
એક લીસી - એક ખરબચડી સપાટી જોઇએ

આમ તો એના ધરમમાં બાળવાની છે પ્રથા
પણ ધરમ છોડી 'પવન'ને ચાલ દાટી જોઇએ

Wednesday, February 29, 2012

"હવે રાજા રાણી સભી ફોન પર છે"

પ્રણયની કહાણી ઘણી ફોન પર છે
હવે રાજા રાણી સભી ફોન પર છે

કહાની સતત આગે વધતી રહેગી
અમારી મુહબ્બત બઢી ફોન પર છે

એ સામે જ આવી ને વાપસ ગયે થે
અમે રાહ દેખી બધી ફોન પર છે

હશે જો એ સામે, મોઢું ફેર લેંગે
કી મૈંને ઉસે બસ ચહી ફોન પર છે

ના હાથોમેં મહેંદી,ના બાલોં મેં ગજરા
અમારી આ બેગમ સજી ફોન પર છે

લગાવો કભી રોંગ નંબર ભી લાગે
રખો હોંસલા તો ઘણી ફોન પર છે

મિલે રૂબરૂ તો બતાવી દઉં મેં
સાલી ભાવ ખાતી બડી ફોન પર છે

કી મૈને ભી દો ચાર ઓપ્શન રખે હૈં
એ કાળી અલગ આ ભુરી ફોન પર છે

નજરમેં નજરકુ મિલાકે ના જોવે
એ જૂઠીની બધ્ધી ટણી ફોન પર છે

વો પૈણેલા લોકોભી શરમાઈ જાએ
અમે ઐસી બાતે જણી ફોન પર છે

કે પેલ્લે તો ખાલી વો દિલ પે ચલાતી
હવેથી છુરી યે ચલી ફોન પર છે

કી મૈને ભી ગલગલિયા મેસેજ કીધાં
ઉસને ભી ચુટલી ખણી ફોન પર છે

સભી કામ છોડીને બેસી ગયા હૂં
અભી જિંદગી મેં ધરી ફોન પર છે

© તોફાની ત્રિપુટી

Tuesday, February 14, 2012

"છુ ગુજરાતી"

છુ ગુજરાતી, ચપટી ગળપણ દરેક શાકમા નાખુ છુઁ..,
એ જ શિરસ્તો, હુ હમેશા વાણીમાઁય રાખુ છુ ..........!!!!!
કઠણ સંજોગો આવે તો, સુકા ચણા ફાકુ છુ ....,
જીવનની ગતિને તોય હુ અશ્વ જેવી રાખુ છુ...!!
ઓછી આવકેય દરિયાવ થઇને, મન મોટુ રાખુ છુ,
આંગણે આવે કોઇ તો, ન કદી હુ એને ધુત્કારુ છુ...!!
નાત-જાત, ધર્મના નામ પર સહિષ્ણુતા રાખુ છુ....,
વારસ છુ હુ બાપુનો, સત્ય અહિંસામા માનુ છુ....!!!
વેપાર કાજે દેશ દેશાવર ખેપ સદા મારુ છુ.....,
રહુ ગમેત્યાઁ,માહ્યલો તો હુ એજ ગુજરાતી રાખુ છુ..

Tuesday, February 7, 2012

"ज़रा देखभालके"

हर फैसलें होते नहिं सिक्के उछालके
ये दिलके मामले हैं ज़रा देखभालके
मोबाइलोंके दौरके आशिक़को क्या पता?
रखतें थे कैसे ख़तमें कलेजा निकालके

Monday, February 6, 2012

"એક છોકરી ગમે છે"

ધંધો ન કોઈ ગમતો ન નોકરી ગમે છે,
કે જ્યારથી અમોને એક છોકરી ગમે છે.

એનો જ એક ચેહરો ઘુમ્યાં કરે મગજમાં,
ના ઘર મને ગમે છે ના ઓસરી ગમે છે.

ટી-શર્ટ જીન્સ પહેરેલી બહેનપણીઓ વચ્ચે,
પંજાબી ડ્રેસ સાદો ને ઓઢણી ગમે છે.

બાબત એ ગૌણ છે કે એમાં લખેલ શું છે?
રાખે ગુલાબ જેમાં એ ચોપડી ગમે છે.

સખીઓની સંગ જ્યારે એ ખાય શિંગ ખારી,
ફેંકે છે જે અદાથી એ ફોતરી ગમે છે.

ધંધો ન કોઈ ગમતો ન નોકરી ગમે છે,
કે જ્યારથી અમોને એક છોકરી ગમે છે.

Thursday, February 2, 2012

"शायरी"

મેરી સોહબતમેં ભેજો તાકે ઈસકા ડર નિકલ જાયે
બહોત સેહમી હુઈ દરબારમેં સચ્ચાઈ રેહતી હૈ

સચ બાત કૌન હૈ જો સરેઆમ કેહ સકે,
મેં કેહ રહા હું મુજે સઝા દેની ચાહિયે.

शाखोंसे टुट जाये वो पत्ते नहिं है हम,
आंधीसे कोइ केह दे के औक़ातमें रहें.

बहोत गुरुर है दरियाको अपने होने पर,
जो मेरी प्याससे उलजें तो धज्जियां उड जायें.

કદ્ર ઈન્સાફકી લોગોં ના ઘટા દી જાયેં,
જુર્મ મૈંને ભી કિયા હૈ તો સઝા દી જાયેં.

अभी ज़िंदा है मा मेरी मुजे कुछ भी नहिं होगा
में घरसे जब निकलता हुं, दुआ भी साथ चलती है

वो जो कुछ लोग फरिश्तोंसे बने फिरतें है
मेरे हथ्थे कभी चड जायें तो इन्सां हो जायें

हमारा दौर अँधेरों का दौर है ,लेकिन
हमारे दौर की मुट्ठी में आफताब भी है

हिम्मत से सच कहो तो बुरा मानते हैं लोग
रो—रो के बात कहने की आदत नहीं रही

Wednesday, January 25, 2012

"રાતનાં બાર વાગે"

ख्वाहिशोंका उछला समंदर, રાતનાં બાર વાગે
લાગણીઓ પણ કેવી બળવત્તર, રાતનાં બાર વાગે

हमारे पेहले मिलनकी वो घडी थी शायद
દુર થયું વર્ષોનું અંતર, રાતનાં બાર વાગે

सुरज सितारें चांद सब भुला बैठें हम
ને તુંય ક્યાં યાદ રહ્યો ઈશ્વર, રાતનાં બાર વાગે

सारी खुदाई पे जैसे अंधेरा सा छा गया
ને કશુંક બળતું રહ્યું અંદર, રાતનાં બાર વાગે

उसने कहाः फुरसद हो तो मिलने आईयेगा
ને હું તો દસેય પગે તત્પર, રાતનાં બાર વાગે

वक़्तके साथ कुछ रिश्तेंभी छुट गये हैं
ક્યાં જવાય છે હવે પેલીના ઘર, રાતનાં બાર વાગે

तुम्हें पढता हुं तो कहीं दिलको चैन आता है
ઇકબાલ, આદિલ ને મુનવ્વર, રાતનાં બાર વાગે

दोनों मिले तो मेहफिल उफान पर पहोंची
"તાહા" ને ઢાલગરવાડનું પાદર, રાતનાં બાર વાગે

Tuesday, January 24, 2012

"इंसान को इंसान बनाया जाए"

अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए।
जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए।

जिसकी ख़ुशबू से महक जाय पड़ोसी का भी घर
फूल इस क़िस्म का हर सिम्त खिलाया जाए।

आग बहती है यहाँ गंगा में झेलम में भी
कोई बतलाए कहाँ जाके नहाया जाए।

प्यार का ख़ून हुआ क्यों ये समझने के लिए
हर अँधेरे को उजाले में बुलाया जाए।

मेरे दुख-दर्द का तुझ पर हो असर कुछ ऐसा
मैं रहूँ भूखा तो तुझसे भी न खाया जाए।

जिस्म दो होके भी दिल एक हों अपने ऐसे
मेरा आँसु तेरी पलकों से उठाया जाए।

गीत उन्मन है, ग़ज़ल चुप है, रूबाई है दुखी
ऐसे माहौल में ‘नीरज’ को बुलाया जाए।

Monday, January 23, 2012

"હાથી બાથી, પ્યાદું બ્યાદું, ખચ્ચર બચ્ચર"

સીધે સીધો વાર હવે તો ચક્કર બક્કર છોડ,
હાથી બાથી, પ્યાદું બ્યાદું, ખચ્ચર બચ્ચર છોડ,

જંગ જીતશું, હવે તો ખુદના નામે જીતશું બસ,
દુઆ બુઆ, દરગાહ બરગાહ, ઈશ્વર બિશ્વર છોડ,

કાન હશે તો સમજી જાશે, મૂંગું મૂંગું બોલ,
કીત્તા બીત્તા, કાગળ બાગળ, અખ્ખર બખ્ખર છોડ,

હોય જીગર તો આવી જા ને હાથ હાથ ની વાત,
તીરો બીરો, ભાલા બાલા, બખતર વખતર છોડ,

દુનિયા આખી હોય જો કરવી તારે ચરણે દોસ્ત!
માં ની ઉની ગોદ ને ઘરનું છપ્પર બપ્પર છોડ,

હવે તમારી તલવારો ને લોહી બોહી ની ભૂખ,
ગાંધી બાંધી, લાઠી બાઠી, બંદર વંદર છોડ,

સમય હવે છે આવી ઉભો દરવાજાની બા'ર,
એકલ એકે કૂદવાનું હો લશ્કર વશ્કર છોડ,

ઈશ્વરનાં હોવા અંગે જો શંકા ના કંઈ હોય,
તાવીજ બાવીજ, ધાગા બાગા, સત્તર વત્તર છોડ,

ચાલ હવે આ દુનિયા તારા દમ પર બદલી નાંખ,
ધરતી બરતી, પાતાળ બાતાળ, અંબર બંબર છોડ,

કામ જ તારાં મ્હોરી ઉઠશે શીશી બીશી ફેંક,
ફોરમ બોરમ, પૂમડાં બૂમડાં, અત્તર બત્તર છોડ,

મગજ બનાવી પાટી તું સૌ એની ઉપ્પર ઘૂંટ,
બસ્તા વસ્તા, ઝોલા વોલા, દફ્તર વફ્તર છોડ,

હવે જમાનો વેપારીનો, એને ખોળે કૂદ,
લેખક વેખક, આશિક વાશિક, શાયર વાયર છોડ,

© તોફાની ત્રિપુટી

Sunday, January 22, 2012

"વરઘોડા"

જબ આપ બારાતકો દેખેં
તો કહિયે નીકલા હૈ વરઘોડા
ઊર્દુ ગઝલોમેં આયે
ગુજરાતી ભી થોડા થોડા

Wednesday, January 18, 2012

"उसने कमाल कर दिया"

हमनें कहाः अगर भुल जाओ हमें तो कमाल हो जायें,
हमनें तो फक़्त बात की, उसने कमाल कर दिया.

Wednesday, January 4, 2012

"એ યાદ આવ્યું અત્યારે"

કેવળ સરિતા સાંભળે એવું સાગર શું પોકારે ? "
ઢળતી સાંજે , સાગર કાંઠે. પૂછ્યું'તું તે જ્યારે,
એ યાદ આવ્યું અત્યારે...

"સ્મરણ"

સ્મરણ જો હોય પોળ કે ગલી,
મઢાવી એને ભીંત પર ટાંગું,
હોય જો નદી સહિતનું ગામ,
કહો જી એને કેમ હું બાંધું ?

Monday, January 2, 2012

"બિચારો શ્યામ ઘણો કન્ફ્યુઝ થયો છે"

રાધાએ સાડીને કપબર્ડમાં મૂકી
……. ને પહેરવા માંડ્યું છે હવે પેન્ટ
……. હવે સમજાયું વ્હાય શ્યામ વેન્ટ.

બિચારો શ્યામ ઘણો કન્ફ્યુઝ થયો છે
……. એને રાધાની લાગ્યા કરે બીક
કે વાંસળીના સૂરથી ન રાધા રોકાય
……. એને વાંસળીથી આવે છે છીંક
રાધા તો પ્લાસ્ટિકનાં ફૂલ ગૂંથે કેશમાં
……. ને ઉપર લગાવે છે સેન્ટ
……. હવે સમજાયું વ્હાય શ્યામ વેન્ટ.

રાધા કહે શ્યામ તમે માખણનાં બદલામાં
……. ચોરી લાવો હીરાનો હાર
વળી ગાય ઉપર બેસવાનું ફાવે નહીં શ્યામ
……. તમે લઈ આવો મારુતિકાર
રે’વાને ફલેટ મારે જોશે ઓ શ્યામ
……. મને ફાવે નહીં તારો આ ટેન્ટ
……. હવે સમજાયું વ્હાય શ્યામ વેન્ટ.

વૃંદાવને શ્યામ મને મળવું ગમે નહીં
……. તું મળવાને હોટલમાં આવ
મારી સહેલીઓને ઈમ્પ્રેસ કરવાને
……. તું હાથોમાં સેલ્યુલર લાવ
રાધા તો ઠીક ઓલી ગોપીઓય આજકાલ
……. શ્યામની કરે છે કોમેન્ટ
……. હવે સમજાયું વ્હાય શ્યામ વેન્ટ.