Friday, June 8, 2012

बम्बई

तन्हाई को खुदमें कभी पलने नही देती
बम्बई किसी बिमार को चलने नही देती

शोहरत यहांकी इस कदर है रोंदती सबको
ये मुफलिसि को चैन से जलने नही देती

जी ये छुपाने शर्म को क्या क्या दिखाती है
ये रोशनी जो बेबसी खलने नही देती

बेशक यहां रह लो मगर ये बात भी सोचो
है फूलती वो खुद मगर फलने नही देती

गर खानी ही है ठोकरें तो कोई गम ना है
पर बाद में ज़ख़्म को मलने नही देती

वो झोंपडोको ही जलाके जगमगाती है,
कुछ भी कर के शाम वो ढलने नहीं देती

- सौरभ पंडया

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